विश्वासघात

विश्वास एक दिन में हासिल नहीं किया जा सकता। लेकिन एक गलत फैसला इसे एक झटके में तोड़ ज़रूर सकता है। बिहार की जनता ने जब भाजपा और जदयू को जनादेश दिया, तब ये जीत विश्वास की सूचक थी। लोग 15 साल के कुशासन और जंगलराज से त्रस्त थे। हमारे लिए राज्य को इस चक्रव्यूह से बाहर निकालना चुनौती भी था और ज़िम्मेदारी भी। हम इस बात को ताल ठोक कर कह सकते हैं कि भाजपा लोगों के विश्वास पर खरी उतरी। हमने ना सिर्फ लोगों तक सड़क, स्वास्थ्य, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं पहुंचाईं बल्कि उन्हें सुरक्षा और सम्मान का माहौल भी दिया। बिहार की आम जनता के लिए ये अहसास उज्ज्वल और बेहतर भविष्य की उम्मीद से भरा था। एक वक्त था जब राजधानी पटना में लोग दिन ढलने के बाद घर से बाहर निकलने से खौफ खाते थे। हमने इस माहौल को बदला,  बिहार के गांव में रहने वाले लोगों के मन से दबंगई और गुंडागर्दी के डर को खत्म किया। बिहार प्रगति के पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा था। लेकिन जब से जदयू ने भाजपा का साथ छोड़ा, बिहार पतन की ओर बढ़ने लगा। नीतीश कुमार अक्सर सुशासन का सेहरा अपने सिर बांधने में लगे रहते हैं। लेकिन महत्वाकांक्षी नीतीश कुमार अगर वाकई विकास पुरुष होते, तो भाजपा का साथ छोड़ने के बाद बिहार यूं बदहाल नहीं होता। बिहार में भाजपा – जदयू गठबंधन टूटने के बाद लोगों के मन में सबसे पहले डर इस बात का आया कि बिहार में अपराध को फिर से शह मिलने लगेगी। लोगों का ये डर सच साबित हुआ है। बिहार में पिछले 20 महीनों में कुशासन और जंगलराज ने जितनी तेज़ी से अपनी पकड़ मज़बूत की है, उसने बिहार को बेहाल कर दिया है। बिहार की अर्थव्यवस्था चरमा गई है । अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत ज़रूरतों के लिए मरीज़ तरस रहे हैं। बिहार का हर शख्स अब ये सवाल पूछ रहा है कि सियासी लालच के लिए आखिर जनादेश का अपमान करने और लोगों के साथ विश्वासघात करने का हक़ नीतीश कुमार को किसने दिया। क्या वाकई नीतीश कुमार को बिहार की फिक्र है या सिर्फ अपने सियासी स्वार्थ को पूरा करना उनका उद्देश्य है ? नीतीश को कहीं विश्वासघात करने की आदत तो नहीं हो गई है। बिहार की जनता के साथ विश्वासघात किया, भाजपा के साथ विश्वासघात किया, अपनी पसंद के चुने हुए मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के साथ विश्वासघात किया। आखिर बिहार कितना बर्दाश्त करेगा... इस विश्वसघात का जवाब नीतीश कुमार को जनता ही देगी।  

Vision for better Bihar- Swachh Bihar 

Bharatiya Janata Party’s senior leader Nand Kishore Yadav believes that cleanliness is essential for wealth and prosperity. Cleanliness and toilet facilities are a big challenge in Bihar. According to the 2011 census, while 51.6 per cent people in Bihar own a mobile phone, only 23 per cent have access to toilets. 77 per cent people are forced to defecate in the open. People residing in urban areas fare slightly better than those living in rural areas, but even their conditions are less than satisfactory. Only 69 per cent people living in urban areas have a toilet at home. While in rural areas, only about 17 per cent people use a toilet. This means that almost 83 per cent people living in rural Bihar lack basic infrastructure like toilets. These figures are alarming and cause concern. In such conditions, the security of women becomes a challenge. Do we want a Bihar mired in dirt, stench and diseases? Do we dream of a Bihar where women feel insecure? No resident of Bihar wants that. People want a clean and healthy Bihar. Bharatiya Janata Party also wants that. Through the Swachch Bharat Abhiyan, Prime Minister Narendra Modi has invited all countrymen to join the cleanliness drive. Time has come for us to pledge to keep our villages, cities, schools, hospitals, etc clean and march together towards a clean state.

संपन्न किसान, समृद्ध बिहार

एक किसान को देखकर आपके मन में सबसे पहले क्या विचार आता है ? ज़ाहिर है, मन आभार से भर जाता है। ये मिट्टी के लाल हैं, मिट्टी में सनकर सोना उगाते हैं। ये हमारे राज्य की, यानी कि बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। बिहार की 81 %आबादी रोज़गार के लिए कृषि पर निर्भर है। राज्य की जीडीपी में कृषि का योगदान 16% है। लेकिन राज्य में ज़्यादातर किसानों के हालात देखकर मन में सवाल उठते हैं। राज्य में ज़्यादातर छोटे किसान हैं। करीब 90 % किसानों के पास 1 हेक्टेयर से भी कम ज़मीन है। आधुनिकता के इस दौर में किसान पारंपरिक साधनों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं। वक्त आ गया है किसान भाइयों के हालात बदलने का, बिहार की कृषि में क्रांति लाने का। संपन्न किसान, समृद्ध बिहार के सपने को साकार करना बीजेपी का लक्ष्य है।

पढ़ोगे, तभी बढ़ोगे...चलिए फैलाएं शिक्षा का प्रकाश  

बिहार के छात्र मेहनती और होशियार हैं। उनमें लगन और आगे बढ़ने की ललक की कोई कमी नहीं। वो मेहनत करके समाज में ऊंचा मुकाम हासिल कर रहे हैं । अफसोस सिर्फ इस बात का है कि उच्च शिक्षा के लिए लाखों छात्र हर साल बिहार से बाहर जाकर पढ़ने के लिए मजबूर हैं।  बिहार में शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को सुलझाने के लिए दो तरह से काम करने की ज़रूरत है। पहला बिहार के हर बच्चे तक मूलभूत शिक्षा सुविधाओं को पहुंचाया जाए। दूसरा, पर्याप्त शिक्षकों की भर्ती करके शिक्षकों की कमी दूर की जाए। शिक्षा में सुधार के लिए शुरुआत प्राइमरी एजुकेशन से ही करनी होगी। बिहार में 896 ऐसे रिहायशी इलाके हैं, जहां 1 किलोमीटर तक प्रारंभिक शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है और 2974 इलाके ऐसे हैं, जहां 3 किलोमीटर तक मिडिल स्कूल नहीं है। आज़ादी के 65 साल बाद भी बिहार में आबादी वाले ऐसे 2100 इलाके हैं जहां शिक्षा सुविधाएं सिफर हैं। एक तरफ स्कूल जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए बिहार के बच्चों को जूझना पड़ता है, वहीं स्कूल टीचरों के अभाव में नए नवेले स्कूलों की बिल्डिंग शिक्षा का मंदिर बनने की बजाए सिर्फ ढांचा बनकर रह गई हैं। बिहार में हर स्तर पर शिक्षकों की भारी कमी है। हद तो तब हो जाती है जब बिहार के कुछ सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में परीक्षा सिर पर होने के बावजूद फैकल्टी की कमी की वजह से सिलेबस पूरा नहीं हो पाता।  मौजूदा सरकार का दावा है कि अगले एकेडमिक सेशन से बिहार को शिक्षकों की कमी से जूझना नहीं पड़ेगा । लेकिन वादों और हकीकत के बीच की सच्चाई वक्त खुद सबके सामने लेकर आ ही जाता है। हम बेहतर बिहार चाहते हैं और उसके लिए शिक्षित बिहार का निर्माण ज़रूरी है। हम वो दिन लाना चाहते हैं जब बिहार के किसी भी छात्र को शिक्षा संस्थानों और शिक्षकों के अभाव में बिहार से बाहर ना जाना पड़े। वो यहीं पढ़ें, बढ़ें और बिहार में रहकर बिहार का नाम रोशन करें। 

बीमार बिहार की तस्वीर को बदलना है

जिस राज्य की राजधानी के सबसे बड़े अस्पताल डेंगू के सामने घुटने टेकते नज़र आते हैं, जिस राज्य में हर दिन 5 साल से कम उम्र के सौ से ज़्यादा बच्चे निमोनिया की वजह से जान गंवा देते हैं, उस राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा होना स्वाभाविक है। स्वास्थ्य को लेकर बिहार बीमार है। हर साल करीब 30 लाख बच्चे बिहार में जन्म लेते हैं। जिनमें से 90,000 बच्चे पैदा होने के 1 महीने के अंदर काल के मुंह में चले जाते हैं।  इसकी वजह है स्वास्थ्य सुविधाओं, प्रशिक्षित स्टाफ और अस्पतालों में साफ सफाई की कमी। पूरे देश में बिहार नवजात शिशुओं की मौत के मामले में दूसरे नंबर पर है। राज्य में मेडिकल कॉलेजों की, रेफरल अस्पतालों की, प्राइमरी हेल्थ सेंटरों की भारी कमी है। इतना ही नहीं, महिला स्वास्थ्य कर्मियों की कमी 50 फीसदी तक है। हाल ही में जारी हुआ राज्य सरकार का रिपोर्ट कार्ड ,काम का लेखाजोखा कम और घोषणा पत्र ज़्यादा लगा। उसमें उन वादों का कोई ज़िक्र ही नहीं किया गया जो बिहार में स्वास्थ्य सुविधाएं सुधारने के लिए किए गए थे। जैसा कि राज्य सरकार ने बिहार के मेडिकल कॉलेजों में स्पेशलाइज़्ड डॉक्टरों की भर्ती करने का वादा किया था। मगर अब तक वादा केवल वादा ही है। मौजूदा जदयू सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं, कई सवाल हैं। आखिर करोड़ों के दवा घोटाले पर राज्य सरकार क्यों चुप है ?  बिहार की जनता से किए आधे अधूरे वादों का हिसाब देने का वक्त करीब है। राज्य में बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए सशक्त कदमों और दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रूरत है । 

 

You are visitor number : Free Hit Counter Instagram